
दिनांक: 26 मई, 2026
पटना: भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल और अत्यधिक संवेदनशील ‘जनगणना 2027’ (Census 2027) का पहला चरण अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। जमीनी स्तर पर तैनात लाखों प्रगणकों (Enumerators) और पर्यवेक्षकों (Supervisors) ने दिन-रात एक करके ‘मकान सूचीकरण और आवास जनगणना’ (Houselisting & Housing Census) का काम लगभग पूरा कर लिया है। लेकिन इस राष्ट्रीय महाअभियान की सफलता के दावों के बीच, बिहार के कई जिलों से एक ऐसी कड़वी हकीकत सामने आ रही है जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और बजटीय आवंटन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विश्वस्त सूत्रों और ग्राउंड जीरो से मिल रही रिपोर्टों के अनुसार, राज्य के विभिन्न जिलों (जैसे भोजपुर, पटना, गया, सारण आदि) के अनेक प्रखंडों में फील्ड स्टाफ को अब तक सरकार द्वारा निर्धारित ‘जनगणना किट’ (Census Kit) मुहैया नहीं कराई गई है। जब अभियान का पहला चरण अपने समापन की ओर है, तब तक प्रगणकों को बुनियादी सुरक्षा और कार्य सामग्री न मिलना स्थानीय स्तर पर एक गंभीर प्रशासनिक विफलता और संभावित वित्तीय अनियमितता की ओर सीधा इशारा करता है।
अलग-अलग जिलों की ग्राउंड हकीकत: कहीं मिला सिर्फ स्केच पेन, तो आइडी के नाम पर कहीं सिर्फ कागज का टुकड़ा
इस पड़ताल में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि किट वितरण में कोई एकरूपता नहीं है। विभिन्न प्रखंडों में अपनी कमियों को छिपाने के लिए स्थानीय प्रशासन ने प्रगणकों को जनगणना कीट के नाम पर स्केच पेन अथवा मैनुअल बूकलेट जैसी आधी अधूरी सामग्री थमा दी है। अगर कोई प्रगणक अथवा पर्यवेक्षक दबी जुबान कीट की मांग भी करता है तो उसे कारवाई का भय दिखाकर चुप करा दिया जाता है ।
अधूरी और बेमेल सामग्री का वितरण:
प्रदेश के भोजपुर,रोहतास,गोपालगंज,भागलपुर इत्यादि जिलों के कई प्रखंडों मे की गई पड़ताल मे यह जानकारी निकलकर सामने आई है की प्रगणकों को जनगणना किट के नाम पर महज दो स्केच पेन देकर टाल दिया गया, वहीं अन्य जिलों के कुछ प्रखंडों में केवल एक कोरा क्लिपबोर्ड या सिर्फ निर्देश पुस्तिका का एक हिस्सा थमा दिया गया है। डिजिटल और आधुनिक जनगणना के इस दौर में प्रगणकों को बैग, लेखन सामग्री, और जरूरी दस्तावेज खुद के पैसों से खरीदने पड़ रहे हैं।
एक प्रगणक किट में सुरक्षित बैग, वाटरप्रूफ क्लिपबोर्ड, पहचान पत्र होल्डर, उच्च गुणवत्ता वाली लेखन सामग्री और निर्देश मैनुअल जैसे आवश्यक टूल्स शामिल होते हैं, जिसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रति कर्मी एक निश्चित और भारी-भरकम बजटीय राशि आवंटित की जाती है।
प्रगणकों का बढ़ता आक्रोश और सुरक्षा की गुहार
बढ़ती गर्मी के प्रकोप और कड़कती धूप में अपनी जेब से पैसे खर्च कर काम कर रहे कर्मचारियों के सब्र का बांध अब टूट रहा है। कर्मचारियों में इस बात का भी गहरा भय है कि यदि इस अधूरी व्यवस्था के कारण डेटा एंट्री या नजरी नक्शा के निर्माण जैसे आती महत्वपूर्ण कार्य में कोई तकनीकी देरी या त्रुटि होती है, तो उच्च अधिकारी अपनी कमियों को छिपाने के लिए इन बेकसूर प्रगणकों और पर्यवेक्षकों पर ही कार्रवाई का डंडा चलाने से भी नहीं चूकेंगे ।
नाम न छापने की शर्त पर राज्य के एक शिक्षक सह पर्यवेक्षक ने बताया:
“हम सरकार के आदेश पर अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं और डेटा फीडिंग अंतिम चरण में है। लेकिन फील्ड में हमारे साथ कोई अप्रिय घटना होती है, तो इस कागज के टुकड़े को देखकर कोई हमें सरकारी कर्मचारी नहीं मानेगा। जब बजट जारी हुआ है, तो हमारी किट जमीनी स्तर तक क्यों नहीं पहुंची? क्या इसे सिर्फ फाइलों में ही बांट दिया गया?”
काम का बोझ भारी, पर जेबें खाली: मानदेय का दूर-दूर तक अता-पता नहीं
इस पूरे महाअभियान में न केवल संसाधनों का टोटा है, बल्कि ग्राउंड पर पसीना बहा रहे प्रगणकों और पर्यवेक्षकों को आर्थिक मोर्चे पर भी पूरी तरह लाचार छोड़ दिया गया है। पहले चरण का कार्य अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है, लेकिन फील्ड कर्मियों को मिलने वाले आधिकारिक मानदेय (Honorarium) और यात्रा भत्ते (TA) की पहली किस्त का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं है। झुलसाने वाली गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच, कई प्रगणक अपने निजी खर्चों और कर्ज लेकर फील्ड में मोबाइल डेटा रीचार्ज कराने और आने-जाने का खर्च उठाने को मजबूर हैं।
प्रशासनिक अनदेखी से बढ़ा रोष, आर्थिक शोषण का आरोप
डिजिटल डेटा एंट्री के लिए लगातार हाई-स्पीड इंटरनेट और मोबाइल के उपयोग से लेकर सुदूर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बार-बार चक्कर लगाने में कर्मियों की जेबें खाली हो चुकी हैं। कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि एक तरफ तो किट के नाम पर अधूरी सामग्री बांटकर खानापूर्ति की गई, और दूसरी तरफ समय पर मानदेय न जारी करके प्रशासन उनके श्रम का सीधे तौर पर शोषण कर रहा है। जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य में लगे इन अग्रिम पंक्ति के कर्मियों को आर्थिक रूप से तंग रखना न केवल उनके मनोबल को तोड़ रहा है, बल्कि इससे पूरी प्रक्रिया की गुणवत्ता प्रभावित होने का अंदेशा भी गहरा गया है।
जवाबदेही तय होना अनिवार्य
भारत की जनगणना देश की आगामी दशकों की नीतियों, बजट और योजनाओं का मुख्य आधार होती है। इस महायज्ञ की जो रीढ़ हैं—यानी हमारे प्रगणक—उन्हें ही इस प्रकार लाचार और असुरक्षित छोड़ देना बेहद चिंताजनक है।
अब समय आ गया है कि रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (ORGI), नई दिल्ली इस मामले का संज्ञान लें और बिहार के विभिन्न जिलों में किट खरीद और वितरण का विशेष ऑडिट करवाएं।
राज्य मुख्यालय तुरंत सभी जिलाधिकारियों (DMs) को निर्देशित करे कि वे अपने-अपने जिलों के चार्ज अधिकारियों (BDOs) से इस कोताही पर जवाब तलब करें और फील्ड कर्मियों को आर्थिक एवं मानसिक सुरक्षा प्रदान करें।










