Census 2027 Bihar: प्रगणकों और पर्यवेक्षकों का दावा—जमीनी हकीकत दर्ज करने के बाद ‘डेटा सुधार’ के नाम पर बदलवाई जा रहीं कुछ प्रविष्टियां; विशेषज्ञ बोले—गलत आंकड़े विकास योजनाओं की दिशा बदल सकते हैं।
पटना | TeacherNama NewsDesk
बिहार में चल रही जनगणना 2027 के प्रथम चरण के अंतिम दौर में एक ऐसा मुद्दा सामने आया है, जिसने आंकड़ों की विश्वसनीयता और सरकारी सर्वेक्षणों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के विभिन्न जिलों में कार्यरत प्रगणकों और पर्यवेक्षकों का आरोप है कि फील्ड स्तर पर एकत्रित वास्तविक सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों में कुछ प्रविष्टियों को “डेटा सुधार” के नाम पर बदलने का मौखिक दबाव बनाया जा रहा है।
कर्मचारियों के अनुसार यह दबाव विशेष रूप से उन सूचनाओं को लेकर अधिक देखा जा रहा है, जो किसी क्षेत्र की आधारभूत सुविधाओं और विकास संकेतकों से जुड़ी हैं। इनमें खुले में शौच (ODF स्थिति), शौचालय की उपलब्धता, बिजली, ईंधन उपयोग, प्रकाश स्रोत और डिजिटल सुविधाओं से संबंधित प्रविष्टियां प्रमुख रूप से शामिल हैं।
इसी संदर्भ में हाल ही में नवादा जिले का मामला व्यापक चर्चा में आया, जहाँ स्थानीय स्तर पर सामने आए आरोपों ने यह बहस छेड़ दी कि क्या जमीनी स्तर पर दर्ज वास्तविक आंकड़ों और अंतिम रिपोर्ट में शामिल आंकड़ों के बीच अंतर पैदा किया जा रहा है। जनगणना कर्मियों का कहना है कि नवादा की घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि उन शिकायतों का एक प्रमुख उदाहरण है जो राज्य के कई हिस्सों से सुनाई दे रही हैं।
सबसे अधिक विवाद ‘खुले में शौच’ से जुड़े आंकड़ों पर
फील्ड में कार्यरत कई कर्मियों का दावा है कि सबसे अधिक दबाव उन परिवारों की प्रविष्टियों को लेकर देखा जा रहा है, जो आज भी शौचालय सुविधा से वंचित हैं या व्यवहारिक रूप से खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
कर्मियों का कहना है कि कई स्थानों पर वास्तविक स्थिति दर्ज किए जाने के बाद उसे बदलकर क्षेत्र को अधिक विकसित या पूर्ण ओडीएफ (Open Defecation Free) दिखाने की कोशिश किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
यही कारण है कि नवादा की घटना ने राज्यभर के जनगणना कर्मियों के बीच एक नई चर्चा को जन्म दिया है।
अधिकारियों का पक्ष: क्या हर ‘ओपन डिफिकेशन’ प्रविष्टि वास्तव में सही है?
जहाँ एक ओर जनगणना कर्मियों का आरोप है कि कुछ प्रविष्टियों में बदलाव के लिए मौखिक दबाव बनाया जा रहा है, वहीं अधिकारियों का पक्ष इससे अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है।
सूत्रों के अनुसार, कई चार्ज अधिकारी और पर्यवेक्षण स्तर के अधिकारी यह तर्क दे रहे हैं कि फील्ड में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जहाँ परिवारों ने स्वयं को ‘खुले में शौच करने वाला’ (Open Defecation) बताया, जबकि सरकारी अभिलेखों के अनुसार उन्हें पूर्व में स्वच्छ भारत मिशन या अन्य योजनाओं के तहत शौचालय निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त हो चुकी है।
अधिकारियों का कहना है कि जनगणना के दौरान कुछ परिवार अपने घर में बने शौचालय का उल्लेख नहीं कर रहे हैं, जबकि प्रशासनिक रिकॉर्ड में उनके नाम पर शौचालय निर्माण की राशि का भुगतान दर्ज है। ऐसे मामलों में यदि प्रगणक केवल परिवार के मौखिक बयान के आधार पर प्रविष्टि दर्ज कर देते हैं, तो सरकारी रिकॉर्ड और जनगणना डेटा के बीच बड़ा अंतर उत्पन्न हो सकता है।
एक अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में तर्क दिया कि—
“यदि किसी लाभार्थी ने शौचालय निर्माण की सरकारी राशि प्राप्त की है, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि शौचालय वास्तव में बना नहीं, उपयोग में नहीं है, या फिर जानकारी दर्ज करते समय उसका उल्लेख नहीं किया गया।”
असली सवाल: डेटा बदला जाए या तथ्यों की पुनः जांच हो?
यही वह बिंदु है जहाँ विवाद सबसे जटिल हो जाता है।
कर्मचारियों का कहना है कि उनका दायित्व मौके पर उपलब्ध स्थिति और परिवार द्वारा दी गई जानकारी दर्ज करना है। दूसरी ओर अधिकारियों का तर्क है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड और फील्ड डेटा में स्पष्ट विरोधाभास दिखता है, तो उसकी पुनः जांच आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, समाधान डेटा बदलने या किसी एक पक्ष को सही मान लेने में नहीं, बल्कि पुनः सत्यापन (Re-verification) की पारदर्शी प्रक्रिया में है।
यदि किसी परिवार ने शौचालय निर्माण के लिए सरकारी सहायता ली है लेकिन आज भी खुले में शौच कर रहा है, तो वह भी नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण सूचना है। वहीं यदि शौचालय मौजूद है लेकिन सर्वेक्षण में उसका उल्लेख नहीं किया गया, तो वह भी डेटा गुणवत्ता का विषय है।
यानी बहस सिर्फ “डेटा बदलने” की नहीं है, बल्कि इस बात की भी है कि जमीन पर दर्ज वास्तविकता, सरकारी रिकॉर्ड और जनगणना के आंकड़ों में यदि अंतर है, तो अंतिम सत्य किसे माना जाए?
यही सवाल आज बिहार के कई जिलों में जनगणना कार्य से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
कर्मचारियों का सवाल: प्रशिक्षण में कुछ और, अब निर्देश कुछ और?
जनगणना कर्मियों का कहना है कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें स्पष्ट रूप से बताया गया था कि प्रगणक का काम केवल तथ्यात्मक जानकारी दर्ज करना है।
उनके अनुसार उन्हें यह निर्देश दिया गया था कि—
“परिवार द्वारा दी गई जानकारी और मौके पर सत्यापित तथ्य ही अंतिम आधार होंगे।”
लेकिन अब कई कर्मियों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर मौखिक रूप से अलग प्रकार के निर्देश दिए जा रहे हैं, जिससे वे असमंजस की स्थिति में हैं।
क्यों महत्वपूर्ण हैं ये आंकड़े?
विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का कार्य नहीं है।
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर तय होते हैं—
- भविष्य के विकास कार्यक्रम
- बजटीय आवंटन
- ग्रामीण विकास योजनाएं
- आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य नीतियां
- सामाजिक न्याय से जुड़ी योजनाएं
यदि किसी क्षेत्र की वास्तविक समस्याएं आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देंगी, तो आने वाली योजनाएं भी उसी अनुपात में प्रभावित होंगी।
2019-20 का कागजी ओडीएफ: डिजिटल डेटा ने खोली पोल
इस पूरे विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और बुनियादी ढांचागत मानक हैं। नवादा जिले से दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट “61607_2.jpg” के अनुसार, जिले को साल 2019-20 में ही कागजों पर 100% ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) घोषित कर प्रति शौचालय ₹12,000 की प्रोत्साहन राशि बांट दी गई थी।
परंतु, वर्तमान में चल रहे जनगणना 2027 के प्रथम चरण के दौरान जब प्रगणकों ने जमीनी स्तर पर जाकर डिजिटल डेटा सिंक किया, तो पोल खुल गई। हकीकत यह है कि आज भी जिले के गांवों और नगर निकायों में लगभग 20 से 25 फीसदी घरों में शौचालय उपलब्ध नहीं हैं।
प्रगणकों और शिक्षकों पर सीधा असर: एफआईआर और शो-कॉज की धमकी
इस प्रशासनिक विफलता और वित्तीय विसंगति को छिपाने के लिए अब जनगणना प्रगणकों और शिक्षकों पर डेटा एडिट कर ‘शौचालय विहीन’ घरों को भी जबरन ऑनलाइन पोर्टल पर ‘शौचालय युक्त’ सकारात्मक दिखाने का मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। विरोध करने वाले कर्मियों को अधिकारियों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ रहा है।
नवादा नगर परिषद क्षेत्र में सर्वे कर रही एक महिला शिक्षिका ने इस प्रताड़ना के खिलाफ सीधे जिला पदाधिकारी को आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है। बात न मानने पर प्रगणकों को ‘औकात’ में रहने की नसीहत दी जा रही है तथा एफआईआर दर्ज कराने की धमकी देकर रात 11 बजे तक बैठाकर डेटा में हेरफेर करवाया जा रहा है।
“मैंने ईमानदारी से काम कर डेटा सिंक कर दिया था। अब चार्ज पदाधिकारी और पर्यवेक्षक द्वारा बिना शौचालय वाले घरों को भी जबरन ओडीएफ दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है। साथ ही दर्ज किए गए आकड़ों में मनमुताबिक संशोधन नहीं करने पर एफआईआर कराने की धमकी दी जा रही है।” — पीड़ित महिला शिक्षिका, नवादा
“सारे आरोप पूरी तरह निराधार हैं। गजाधर मांझी के घर पर शौचालय उपलब्ध है, लेकिन शिक्षिका ने सर्वे में इसे अंकित नहीं किया था। लापरवाही को लेकर शिक्षिका को शो-कॉज (कारण बताओ नोटिस) जारी किया गया है।” — सत्येंद्र प्रसाद वर्मा, कार्यपालक पदाधिकारी, नगर परिषद नवादा
नवादा से उठे सवाल, अब पूरे बिहार में छिड़ी बहस
नवादा की घटना ने एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया है—
क्या सरकारी आंकड़ों का उद्देश्य वास्तविक स्थिति को दर्ज करना है या उपलब्धियों को प्रदर्शित करना?
यही सवाल आज जनगणना कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नीति विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

जनगणना का मूल्य उसकी संख्या में नहीं, उसकी सत्यता में होता है।
यदि आंकड़े जमीनी हकीकत का प्रतिबिंब हैं, तो वे विकास का रास्ता भी दिखाते हैं। लेकिन यदि आंकड़ों और वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ती है, तो योजनाएं कागज पर सफल और जमीन पर विफल दिखाई देने लगती हैं। बिहार में उठी यह बहस केवल जनगणना की नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में डेटा की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे की भी परीक्षा है।










