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बिहार: जनगणना कार्य में ‘डेटा सुधार’ के नाम पर मौखिक दबाव का आरोप, कर्मचारियों में असमंजस की स्थिति

On: May 26, 2026 5:58 PM
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भारत की जनगणना
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26 मई, 2026
पटना: बिहार में चल रहे “भारत की जनगणना 2027 ” के प्रथम चरण का कार्य अपनी समाप्ति पर है किन्तु इस आती महत्वपूर्ण कार्य की शुचिता और कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। राज्य के विभिन्न जिलों में तैनात प्रगणकों (Enumerators) और पर्यवेक्षकों (Supervisors) ने आरोप लगाया है कि उन पर चार्ज अधिकारियों के द्वारा फील्ड से एकत्रित वास्तविक सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों में बदलाव करने का मौखिक दबाव बनाया जा रहा है। इस संबंध में आधिकारिक व्हाट्सएप समूहों (Official WhatsApp Groups) के कुछ कथित वायरल स्क्रीनशॉट भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं, जिसने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।

व्हाट्सएप चैट वायरल: प्रविष्टियों को बदलने का दबाव

सूत्रों के अनुसार, आधिकारिक समन्वय के लिए बनाए गए व्हाट्सएप ग्रुप्स में कई जनगणना कर्मियों ने खुलकर अपनी चिंताएं साझा की हैं। वायरल संदेशों के मुताबिक, कर्मियों से फील्ड में जाकर सत्यापित किए गए वास्तविक डेटा को “सुधार” करने को कहा जा रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि यह कथित सुधार जमीनी हकीकत के आधार पर नहीं, बल्कि कुछ खास प्रविष्टियों को प्रशासनिक स्तर पर “अनुकूल” दिखाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
जनगणना कर्मियों का कहना है कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सख्त निर्देश दिए गए थे कि नागरिकों द्वारा दी गई जानकारी और प्रत्यक्ष सत्यापन के आंकड़ों में किसी भी परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में अब मिल रहे मौखिक निर्देशों ने उनके सामने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।


इन मुख्य मानकों पर है केंद्रित दबाव:

प्राप्त जानकारियों के अनुसार, सबसे अधिक दबाव परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े बुनियादी ढांचागत मानकों पर देखा जा रहा है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • शौचालय की उपलब्धता: खुले में शौच (Open Defecation) से जुड़े आंकड़ों को कम करने का प्रयास।
  • उर्जा और ईंधन: “बिजली की अनुपलब्धता” (No Light) तथा “एलपीजी कनेक्शन होने के बावजूद लकड़ी का उपयोग” (Using Firewood) जैसी श्रेणियों को बदलने का दबाव।
  • प्रकाश स्रोत की उपलब्धता : बिजली या मिट्टी के तेल जैसे विकल्पों को भी बदलने का दबाव।
  • संचार सुविधाएं: परिवारों के पास उपलब्ध आधुनिक संचार माध्यमों जैसे की पैड मोबाईल अथवा स्मार्टफोन के विवरण।

कर्मियों का तर्क है कि यदि किसी परिवार ने स्वयं अपनी वास्तविक स्थिति दर्ज कराई है, तो प्रशासनिक स्तर पर उसे बदलना किसी भी स्थापित नियम या प्रक्रिया के अंतर्गत न्यायसंगत नहीं है।

विशेषज्ञों ने जताई चिंता: नीतियों पर पड़ेगा असर

इस पूरे घटनाक्रम पर सांख्यिकीविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना केवल एक संख्यात्मक संग्रह नहीं है, बल्कि यह देश और राज्य की आगामी दशकों की योजनाओं, बजटीय आवंटन और कल्याणकारी नीतियों की आधारशिला होती है।

“यदि जमीनी हकीकत को छिपाकर ‘सुधारे गए’ आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं, तो भविष्य में बनने वाली विकास योजनाएं बेअसर साबित होंगी और वास्तविक लाभार्थियों तक सरकारी सहायता नहीं पहुंच पाएगी।” — सामाजिक विश्लेषक

आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार:

यद्यपि इस मामले में अभी तक किसी विशिष्ट अधिकारी या कर्मचारी का नाम आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है और न ही विभाग द्वारा किसी लिखित आदेश की पुष्टि हुई है, लेकिन राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आ रही रिपोर्टें जमीनी स्तर पर गहरे असंतोष और भ्रम की ओर इशारा कर रही हैं।
अब यह आवश्यक हो गया है कि संबंधित उच्च प्रशासनिक विभाग इस मामले का स्वतः संज्ञान ले, जमीनी स्तर पर चल रहे इस गतिरोध की निष्पक्ष समीक्षा करे और फील्ड स्टाफ के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे ताकि देश के इस सबसे महत्वपूर्ण सांख्यिकीय कार्य की विश्वसनीयता पर कोई आंच न आए।

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